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जैविक खेती- Organic Farming

जैविक खेती (Organic Farming) - जानकारी, अर्थ, परिभाषा, सिद्धांत, उद्देश्य, महत्व, घटक, लाभ एवं दोष | Meaning, definition, purpose, importance, principles, components, benefits and problems of organic farming in india in hindi - your rd farms

जैविक खेती क्या है? जैविक खेती का अर्थ एवं परिभाषा | what is organic farming ?, meaning and definition of organic farming in hindi :

Your RD farms : हरित क्रांति के बाद से ही हमारे देश के किसान अधिक कृषि उत्पादन के लालच में खेतों में हानिकारक कृषि रसायनो व उर्वरकों को अंधाधुंध प्रयोग करते आ रहे हैं। प्रारंभ में यह हानिकारक उर्वरक व रसायन किसानों को अधिक उत्पादन तो देते हैं लेकिन समय के साथ ही साथ यह उत्पादन घटते ही  जाते हैं। इसके साथ देश की मृदा भी अम्लीय होती जा रही हैं। वर्तमान में हालत इतना बदतर होते जा रहे हैं कि बिना रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशको के प्रयोग से बहुत से फसलों का उत्पादन करना ही संभव नहीं हैं। रसायनिक खादों व कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से मृदा की उर्वरता कम हुई तो इसका प्रभाव मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर भी पड़ा। जिसे देखते हुए मृदा को बचाए रखने, भोज्य पदार्थों को रसायन मुक्त करने व बढ़ती आबादी के लिए कृषि उपज को बढ़ाने के लिए हमारे पास सिर्फ एक ही विकल्प मौजूद है और वह है जैविक खेती (organic farming)। यही कारण है कि वर्तमान में हमारे देश में जैविक खेती काफी लोकप्रिय होती जा रही है। जो हरित क्रांति के बाद भारत में जैविक खेती का प्रयोग एक क्रांतिकारी कदम रहा। जिसका आरम्भ सर्वप्रथम भारत के मध्य प्रदेश राज्य में सन 2001-2002 में जैविक खेती का आंदोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकासखंड के एक गांव में जैविक खेती की शुरुआत की गई। इसी आधार पर उस गांव का नाम जैविक गांव रखा गया इस प्रकार भारत में प्रथम वर्ष में कुल 313 गांवो में जैविक खेती का आरंभ किया गया।


 जैविक खेती का अर्थ | meaning of organic farming in hindi :

 (A). जैविक खेती एक तकनीक हैं। जिसमें पेड़-पौधे व जानवरों को प्राकृतिक विधि से पालन-पोषण होता है। इस प्रक्रिया में जैविक पदार्थों का प्रयोग करते हुए मृदा उर्वरता को बचाएं व पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के प्रयोग के बिना फसलों को उगाना उसे पोषण करना आदि को शामिल किया जाता हैं।
(B). जैविक खेती, खेती का आधुनिक तरीका है जहां पर प्राकृति एवं पर्यावरण को संतुलित रखते हुए किसी भी हानिकारक रसायनो व उर्वरकों के प्रयोग के बिना खेती की जाती है।
(C).  जैविक खेती एक ऐसी प्रणाली है जिसमें किसी भी अजैविक अदानो (जैसे- रसायनिक खाद ,कीटनाशक आदि) का प्रयोग किए बिना सिर्फ जैविक आदानों (जैसे- जैव अवशिष्ट, फसल चक्र, हरि खाद, केंचुए की खाद, गोबर की खाद आदि) का प्रयोग करके फसलों का उत्पादन किया जाता हैं।

जैविक खेती की परिभाषा | organic farming definition in hindi :

जैविक खेती को हम निम्नवत रूपो से परिभाषित कर सकते है
(A). जैविक खेती, खेती की वह विधि है जिसमें मृदा को स्वस्थ व जीवंत रखते हुए केवल जैव अवशिष्ट पदार्थ तथा जीवाणु खाद के प्रयोग से प्रकृति के साथ सामान्य रखकर टिकाऊ फसल उत्पादन किया जाता है जैविक खेती (organic farming) कहलाती हैं। 
(B). जैविक खेती का अर्थ प्रकृति के साथ जुड़कर खेती करना है इस प्रक्रिया में सभी अवयव व प्रणालियां एक दूसरे से जुड़ी है।
 Note - जैविक खेती को पारिस्थितिकी खेती भी कहा जाता हैं। IFOAM ने सन 1998 में आधुनिक कृषि से उत्पन्न समस्याओं के निवारण हेतु ऑर्गेनिक फार्मिंग की सिफारिश की है। देश में जैविक खेती को NPOF (National Project On Organic Farming) की शुरुआत अक्टूबर 2004 से की गयी।

जैविक खेती का उद्देश्य | purpose of organic farming in hindi :

 जैविक खेती का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संतुलन को कायम रखते हुए कम लागत वाली कृषि तकनीक अपना कर खेती करना इसके अंतर्गत रसायन एवं पेस्टिसाइड मुक्त कृषि उत्पाद का उत्पादन किया जाता हैं। जिससे कृषि स्वस्थ, लाभकारी हो, टिकाऊ खेती को करते हुए कृषकों के आर्थिक स्तर में  सुधार हो तथा किसान आत्मनिर्भर एवं सक्षम हो सकें। कृषि से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम से कम करना व लाभदायक जीवों का संरक्षण करना है। खेती में अंधाधुंध प्रयोग हो रहे हानिकारक रसायनो, उर्वरकों व कीटनाशकों का प्रयोग को रोकना या नहीं के बराबर प्रयोग करना जिससे कि मानव स्वास्थ्य को हो रहे नुकसान को कम किया जा सके। कृषि उत्पाद रसायन रहित व उच्च गुणवत्ता का उत्पादन करना। मिट्टी की उर्वरा शक्ति को नष्ट होने से बचाना तथा समुचित मात्रा में प्राकृतिक विधि द्वारा पौधों को आवश्यक सभी पोषक तत्व को उपलब्ध कराना।

जैविक खेती के घटक | component of organic farming in hindi :

जैविक खेती के निम्नलिखित घटक है.

(A) गोबर की खाद | FYM :

यह जैविक खेती (organic farming) का सबसे महत्वपूर्ण घटक (component) है। क्योंकि यह किसानों को सबसे आसानी से प्राप्त होने वाला खाद है। फार्म पर रहने वाले पशुओं के मल-मूत्र उसके नीचे के विछावन और उसके खाने के बचे हुए व्यर्थ चारे से जो खाद तैयार होता है उसे गोबर की खाद कहते हैं। इस खाद से फसल को भोजन के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व उपलब्ध हो जाते हैं।

(B) जैविक खाद | organic manure :

जैविक खाद (organic manure) का तात्पर्य कार्बनिक खाद से है जो सड़ने पर कार्बनिक पदार्थ पैदा करते हैं। कार्बनिक पदार्थ के अंतर्गत पेड़ पौधे के अवशेष जैसे पत्ते, जड़, टहनियां, फल-फूल आदि आते हैं। इसके अतिरिक्त सूक्ष्मजीव, कीड़े-मकोड़े तथा जंतु के मृत शरीर जो मृदा में मिलकर कार्बनिक पदार्थ का निर्माण करते हैं जैविक खाद के अन्तर्गत आते हैं। मृदा में कार्बनिक पदार्थ के सड़न गलन से ह्यूमस का निर्माण होता है इससे मृदा का रंग काला हो जाता है।


(C) हरि खाद | Green manure : 

 वर्षाकाल में जल्दी बढऩे वाली वे दलहनी फसलें जिनका बोने का मुख्य उद्देश्य जैविक खाद होता है हरि खाद कहलाती हैं। इस प्रकार के खाद से पौधों के लिए आवश्यक सभी पोशक तत्वों की पूर्ति आसानी से हो जाता हैं। तथा इससें मृदा की भौतिक सुधार भी हो जाती हैं।

(D) वर्मि कम्पोस्ट | Vermicompost : 

 इसे केंचुए की खाद भी कहते है। क्योंकि इस खाद को बनाने में केंचुए का उपयोग किया जाता है। गोबर व अन्य जैविक पदार्थो को केंचुओं द्वारा अल्प समय में ही उच्च गुणवत्ता युक्त खाद मे बदल दिया जाता हैं।


(E) फसल चक्र | crop rotation :

 किसी नीश्चित क्षेत्र में एक निश्चित समय में फसलों का इस क्रम में उगाया जाना की मृदा की उर्वरा शक्ति का कम से कम हानि हो फसल चक्र कहलाता हैं। फसल चक्र को अपनाने से बहुत से लाभ होते हैं। इससे मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती हैं। तथा रोग, कीट व खरपतवार के नियंत्रण में सहायता मिलती है। सीमित साधनों का अधिकतम उपयोग कर अधिक उत्पादन करना संभव होता है। साथ ही साथ मृदा क्षरण से रक्षा,फसलों का घरेलू एवं बाजार मांग की पूर्ति में आसानी रहती हैं।


(F) जैव उर्वरक | Bio Fertilizer :

 जैविक उर्वरक न केवल वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण और फास्फोरस को घुलनशील बनाने में अपना योगदान करते हैं बल्कि विभिन्न वृद्धि हार्मोन और अम्लो के निर्माण के द्वारा पौधों की वृद्धि और विकास में सहायक होने के साथ ही साथ मृदा की भौतिक अवस्था में सुधार का भी कार्य करते हैं।
"ऐसे जीवाणु सम्बध्द जिसमें जीवाणुओं की जीवित कोशिकाएं होती हैं जब प्रयोग में लाए जाते हैं तब अपनी शक्तियों से वातावरण की नाइट्रोजन और भूमि में स्थित फास्फोरस को पौधे के लिए उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं जैव उर्वरक कहलाते हैं।"
यह निम्नलिखित प्रकार के होते हैं..


(1) नील हरित शैवाल | Blue Green Algae :

नील हरित शैवाल निम्न शैली के पादप होते हैं जिसे सायनोबैक्टीरिया भी कहा जाता है। यह एक कोशकीय जीवाणु होते हैं जो तन्तु के होते हैं। इस जीवाणु को धान की फसल के लिए वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को भूमि में स्थापित कराने के उद्देश्य से प्रयोग में लाया जाता हैं। यह शैवाल प्रकाश संश्लेषण से उर्जा ग्रहण करके वायुमंडलीय नाइट्रोजन का भूमि मे स्थितिकरण का कार्य करते हैंं। धान के खेत में नील हरित शैवाल के उपयोग से 20 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर स्थिकरण होता है। मृदा में कार्बनिक पदार्थ तथा पौध  वृद्धिवर्धक रसायन जैसे- आक्जिन, जिब्रेलिक, पाइरिडोक्सीन आदि की मात्रा होती है। जिसको स्थिरीकरण करते हैं। जिसमें की फसल के उत्पादन में लगभग 20-25% की वृद्धि होती है।तथा अम्लीय व क्षारीय मृदा का भी सुधार होता है।


(2) अजोला | Azolla :

अजोला ठंडे पानी में उगने वाला एक घास होता है जो प्रायः तालाबों और पानी भरे स्थानों पर तैरती हुई उगते हैं। इसकी वृद्धि इतनी तीव्र गति से होती है कि यह 20 से 30 दिनों के भीतर ही अपने से दुगने हो जाते हैं। अजोला का उपयोग धान की फसल में जैव उर्वरक के रूप में प्रयोग में लाया जाता है इसकी वृद्धि के कारण या धान की फसल में नील हरित शैवाल की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुई है अजोला की नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता अधिक होती है। यह जल्दी ही कार्बनिक पदार्थ में परिवर्तन हो जाते हैं तथा मृदा के भौतिक गुणों में सुधार होता है। जैव उर्वरक के रूप में इसका प्रयोग दक्षिण पूर्वी के देश जैसे- थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया तथा चीन में बहुत में बडे पैमाने पर किया जाता है।


(3) एजोटोबेक्टर | Azotobactor :

एजोटोबेक्टर  नामक जैव उर्वरक में एजोटोबेक्टर जीवाणु पर्याप्त मात्रा में होते हैं। इस जीवाणु के संवाहक के रूप में कोयले का चूरा प्रयोग में लाया जाता हैं। यह भूमि एवं पौधों की जड़ों की सतह पर स्वतंत्र रूप में रहते हुए ऑक्सीजन की उपस्थिति में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनिया में परिवर्तित करके पौधों को उपलब्ध कराते रहते हैं। यह जीवाणु पौधों की जड़ों से उत्सर्जित पदार्थ को ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयोग करते हैं। इसका प्रयोग खाद्यान्न फसलों, तिलहन, फलों व सब्जियों की फसलों एवं बागवानी के फसलों में किया जाता हैं। इसके प्रयोग से मृदा में 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन पर उपलब्ध हो जाती हैं। इसका उपयोग करने से फसलों के उत्पादन में लगभग 15 से 20% की वृद्धि होती हैं।

 

(4) राइजोबियम | Rhizobium :

राइजोबियम दलहनीय फसलों के जड़ ग्रंथियों में पाया जाता है। यह जीवाणु जड़ ग्रंथियों के Coretex में निवास करता है और वहीं से वायुमंडल में विद्यमान नाइट्रोजन का स्थिकरण करता रहता है। राइजोबियम जीवाणु का एक विशेष व्यवहार होता है जिसे कारण विभिन्न प्रकार की दलहनी फसलों के लिए अलग-अलग प्रजातियों के जीवाणु की आवश्यकता होती हैं। इसके प्रयोग से लगभग 20 से 25 किलोग्राम वायुमंडलीय नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर स्थिकरण होता है। तथा इसके प्रभाव प्रयोग से मृदा मे कोई भी कुप्रभाव नहीं पड़ता है। तथा फसलों में इसके उपयोग करने से फसल उत्पादन में 20% की वृद्धि हो जाती हैं।


(5) फास्फोरस को घुलनशील बनाने वाले जैव उर्वरक | Bio fertilizer for phosphate solubility :

फास्फोरस, नाइट्रोजन के पश्चात पौधों की वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक प्रमुख पोषक  तत्व है। मृदा में होने वाली विभिन्न भू-रासायनिक प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप फास्फोरस के अघुलनशील रूप में रहने के कारण पौधों में प्रायः इस तत्व की कमी पाई जाती है। फास्फोरस की मृदा में विद्यमान अनुपलब्धता मात्र को कुछ जीवाणुओं द्वारा कार्बनिक अम्ल का निर्माण करके घुलनशील बनाया जाता है। जिससे इस घुलनशील फास्फोरस की  उपलब्धता संभव हो जाती हैं।


जैविक खेती के लाभ | organic farming benefits in hindi :

जैविक खेती से किसानों को निम्नलिखित लाभ होतें है
(A). जैविक खेती(organic farming) से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है क्योंकि इस बीच में हम जैविक तत्व का ही प्रयोग करते हैं।
(B). जैविक खेती (organic farming) से पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य पर कोई भी बुरा प्रभाव नहीं पड़ता ।
(C). जैविक खेती (organic farming)  सेे भूमि में लाभदायक जीवों की संख्या में वृद्धि हो जाती हैं।
(D). जैविक खेती (organic farming) के उत्पाद का अधिक मांग होने के कारण उपज का अधिक लाभ मिलता हैं।
(E). लागत में कमी आती है क्योंकि बाजार में उपलब्ध मंहगे रसायनों का प्रयोग न करके सिर्फ जैविक पदार्थों का ही उपयोग किया जाता हैं।
(F). इस विधि से खेती करने पर पानी की भी बचत होती है क्योंकि जैविक खेती करने के कारण भूमि में जल धारण क्षमता की वृद्धि होती हैं।
(G). फसल अवशेषों को नष्ट करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि इसको खाद के रूप में उपयोग कर लिया जाता हैं।


जैविक खेती के दोष | organic farming problems in hindi : 

(A). जैविक पदार्थ का अभाव :

   हमारे देश में जैविक खेती अपनाने में सर्वाधिक बाधा जैविक पदार्थ का अभाव भी है आज भी हमारे देश में फसलों की कटाई के उपरांत फसलों के अवशेषों को नष्ट कर दिया जाता है एक तो देश में जैविक पदार्थ का अभाव है तो दूसरी ओर इन फसल अवशेषों को इस तरह से नष्ट कर दिया जाता है।


(B). जैविक खाद बनाने में अतिरिक्त जगह की आवश्यकता :  

 जैविक खाद बनाने के लिए किसानों को एक अतिरिक्त जगह की आवश्यकता होती है एक तो हमारे देश में अधिकतर किसान के पास एक एकड़ या उससे भी कम खेत उपलब्ध है जिससे कि किसान इस अतिरिक्त खेत को उपलब्ध नहीं करा पाते हैं।


(C). किसानों को तकनीकी जानकारी का अभाव : 

  हमारे देश में अधिकतर किसान कम पढ़े लिखे होते हैं जिससे कि किसानों के पास कंपोस्ट खाद बनाने व उसके उपयोग करने की तकनीकी जानकारी का अभाव होता हैं। अधिकतर किसान एक गड्ढा खोदकर उसे कचरे से भर देते है। और बरसात के मौसम में यह गड्ढा पानी से भर जाता है जिससे कि वह कचरा आसानी से सड़-गड़ नहीं पाता और अच्छी तरह से कंपोस्ट खाद नहीं बन पाता।


(D). अधिक लागत का होना :

 शुरुआत में जैविक खेती अपनाने पर खेती में अधिक लागत आते हैं। तथा उस अनुपात में कृषि उत्पाद का मूल्य नहीं मिल पाता जिससे कृषक जैविक खेती अपनाने से पीछे भागते हैं।


(E). जैविक कृषि उत्पाद का उचित मूल्य मिल पाना : 

 हमारे देश में जैविक कृषि उत्पाद की अलग बाजार ना होने के कारण कृषकों को रासायनिक कृषि उत्पाद व जैविक कृषि उत्पाद का बाजार मूल्य एक ही प्राप्त होता है। जिससे कृषक जैविक खेती नही अपना पाते।


(F). फसलों को एक निश्चित पोषक तत्वों की पूर्ति की समस्या : 

रासायनिक खेती की तुलना में जैविक खेती करने पर किसान फसलों मे किसी निश्चित पोषक तत्व उपलब्ध नहीं करा पाते हैं। उदाहरण के साथ समझा जाए तो यदि कोई कृषक टमाटर की  खेती करता है तथा उसे फसल में बोरान नामक तत्व की कमी के कारण उसके टमाटर के फल फट रहा हैं तो वह कृषक जैविक रूप से तत्काल बोरान तत्व को फसल में उपलब्ध नहीं करा पाएगा जबकि रासायनिक रूप से बाजार में बहुत से बोरान उपलब्ध है जिसका एक या दो स्प्रे मात्र से ही फसलों में बोरान तत्वों की पूर्ति की जा सकती हैं।
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